क्यों मनाते हैं मुहर्रम | Imam Hussain Karbala Story in Hindi
Published: 1 year ago By: Ashwani Shrotriya

By: Ashwani ShrotriyaPublished: 1 year ago

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Mourning of Muharram: The word Ashura means 10, and the holiday is the tenth day of Muharram, the first month of the Islamic calendar. For Shi'ite Muslims, those ten days are a period of mourning and remembrance, where they commemorate the death of Hussein ibn Ali, the grandson of the Prophet Muhammad.

| SCRIPT |
इमाम हुसैन की शहादत की याद में आज दुनियाभर में शिया मुस्लिम मुहर्रम मना रहे हैं...इमाम हुसैन, पैगंबर मोहम्मद के नाती थे...जो कर्बला की जंग में शहीद हुए थे...मुहर्रम क्यों मनाया जाता है...इसके लिए हमें तारीख के उस हिस्से में जाना होगा, जब इस्लाम में खिलाफत यानी खलीफा का राज था...ये खलीफा पूरी दुनिया के मुसलमानों का प्रमुख नेता होता था..पैगंबर साहब की वफात के बाद चार खलीफा चुने गए थे...लोग आपस में तय करके इसका चुनाव करते थे...इसके करीब 50 साल बाद इस्लामी दुनिया में घोर अत्याचार का दौर आया...मक्का से दूर सीरिया के गर्वनर यजीद ने खुद को खलीफा घोषित कर दिया...उसके काम करने का तरीका बादशाहों जैसा था...जो उस समय इस्लाम के बिल्कुल खिलाफ था...इमाम हुसैन ने उसे खलीफा मानने से इनकार कर दिया...इससे नाराज यजीद ने अपने राज्यपाल वलीद पुत्र अतुवा को फरमान लिखा, 'तुम हुसैन काे बुलाकर मेरे आदेश का पालन करने को कहो...अगर वो नहीं माने तो उसका सिर काटकर मेरे पास भेजा जाए'.... राज्यपाल ने हुसैन को राजभवन बुलाया..और उनको यजीद का फरमान सुनाया...इस पर हुसैन ने कहा- "मैं एक व्याभिचारी, भ्रष्टाचारी और खुदा रसूल को न मानने वाले यजीद का आदेश नहीं मान सकता"... इसके बाद इमाम हुसैन मक्का शरीफ पहुंचे..ताकि हज पूरा कर सकें...वहां यजीद ने अपने सैनिकों को यात्री बनाकर उनका कत्ल करने के भेजा...इस बात का पता हुसैन को चल गया और लेकिन मक्का ऐसा पवित्र स्थान है, जहां किसी की भी हत्या हराम है...खून-खराबे से बचने के लिए हुसैन उमरा करके परिवार सहित इराक चले आए....मुहर्रम महीने की दो तरीख 61 हिजरी को हुसैन अपने परिवार के साथ कर्बला में थे.. नौ तारीख तक वो यजीद फौज को सही रास्ते पर लाने के लिए समझाते रहे, लेकिन वो नहीं माने... इसके बाद हुसैन ने कहा- "तुम मुझे एक रात की मोहलत दो..ताकि मैं अल्लाह की इबादत कर सकूं"..इस रात को 'अासुर की रात' कहा जाता है...अगले दिन जंग में उनके 72 फॉलाेअर्स मारे गए...तब सिर्फ हुसैन ही अकेले रह गए थे...तभी उनके खेमे में शोर मचा...उनका छह महीने का बेटा अली असगर प्यास से बेहाल था... हुसैन उसे हाथों में उठाकर मैदान-ए-कर्बला में ले आए...उन्होंने फौज से बेटे को पानी पिलाने के लिए कहा, लेकिन फौज नहीं मानी और बेटे ने हुसैन की हाथों में तड़प कर दम तोड़ दिया..इसके बाद भूखे-प्यासे हजरत इमाम हुसैन का भी कत्ल कर दिया गया...हुसैन ने इस्लाम और मानवता के लिए अपनी जान कुर्बान की थी...इस इसे आशुर यानी मातम का दिन कहा जाता है..इराक की राजधानी बगदाद के दक्षिण पश्चिम के कर्बला में इमाम हुसैन और इमाम अब्बास के तीर्थ स्थल हैं।

| URDU SCRIPT |

امام حسین کی شہادت کی یاد میں آج دنیا بھر میں شیعہ مسلم محرم منا رہے ہیں ... امام حسین، نبی محمد کے ناتی تھے ... جو کربلا کی جنگ میں شہید ہوئے تھے ... محرم کیوں منایا جاتا ہے ... اس کے ہمیں تاریخ کے اس حصے میں جائیں گے، جب اسلام میں خلافت یعنی خلیفہ کا راج تھا ... یہ خلیفہ پوری دنیا کے مسلمانوں کا اہم لیڈر ہوتا تھاپےگبر صاحب کی وفات کے بعد چار خلیفہ منتخب ہوئے تھے ... لوگ آپس میں طے کرکے اس کا انتخاب کرتے تھے ... اس کے تقریبا 50 سال بعد اسلامی دنیا میں سخت ظلم کا دور آیا ... مکہ سے دور شام کے گورنر يجيد نے خود کو خلیفہ قرار دیا ... اس کے کام کرنے کا طریقہ بادشاہوں جیسا تھا ... جو اس وقت اسلام کے بالکل خلاف تھا ... امام حسین نے اسے خلیفہ ماننے سے انکار کر دیا ... اس سے ناراض يجيد نے اپنے گورنر ولید بن اتوا کو فرمان لکھا، 'تم حسین كاے بلا کر میرے حکم کی عمل کرنے کو کہو ... اگر وہ نہیں مانے تو اس کا سر کاٹ کر میرے پاس بھیجا جائے '.... گورنر نے حسین کو شاہی محل بلاياور ان يجيد کا فرمان سنایا ... اس حسین نے کہا "میں نے ایک ويابھچاري، بدعنوان اور خدا رسول کو نہ ماننے والے يجيد کا حکم نہیں مان سکتا "... اس کے بعد امام حسین مکہ شریف پهچےتاك حج پورا کر سکیں ... وہاں يجيد نے اپنے فوجیوں کو مسافر بنا کر ان کا قتل کرنے کے بھیجا ... اس بات کا پتہ حسین کو چل گیا اور لیکن مکہ ایسا مقدس مقام ہے جہاں کسی کی بھی قتل حرام ہے ... خون خرابے سے بچنے کے لئے حسین عمرہ کر کے خاندان سمیت عراق چلے آئے .... محرم ماہ کی دو تريكھ 61 ہجری کو حسین اپنے خاندان کے ساتھ کربلا میں تھے .. نو تاریخ تک وہ يجيد فوج کو صحیح راستے پر لانے کے لئے سمجھاتے رہے، لیکن وہ نہیں مانے ... اس کے بعد حسین نے کہا "تم مجھے ایک رات کی مہلت دوتاك میں اللہ کی عبادت کر سکوں ".. اس رات کو 'ااسر کی رات' کہا جاتا ہے ... اگلے دن جنگ میں ان کے 72 پھلاےرس ہلاک ... پھر صرف حسین ہی اکیلے رہ گئے تھے. تبھي ان کی صفوں میں شور مچا ... ان کا چھ ماہ کا بیٹا علی اصغر پیاس سے بے حال تھا ... حسین اس کے ہاتھ میں اٹھا کر میدان کربلا میں لے آئے ... انہوں نے فوج سے بیٹے کو پانی پلانے کے لئے کہا، لیکن فوج نہیں مانی اور بیٹے نے حسین کی ہاتھوں میں تڑپ کر دم توڑ دياسكے بعد بھوکے پیاسے حضرت امام حسین کا بھی قتل کر دیا گیا تھا ... حسین نے اسلام اور انسانیت کے لئے اپنی جان قربان کی تھی. س اس کو اشر یعنی ماتم کا دن کہا جاتا هےراك کے دارالحکومت بغداد کے جنوب مغرب کے کربلا میں امام حسین اور امام عباس کے مزار سائٹ ہیں.

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